बुधवार, 24 फ़रवरी 2016

|| आँखों में रहता है कोई ||
- पवन प्रताप सिंह 'पवन'

आँखों की कोरों से अक्सर
चुप-चुपके बहता है कोई
आँखों में रहता है कोई ।

गीली आँखें बाँच रहीं हैं
हिय के कोरे पन्ने 
पन्ने बहुत पुराने 
धुँधलाए-से 
फटे फटे 

नमकीनी अंतस-पन्नों का 
खारापन सहता है कोई
आँखों में रहता है कोई ।

मन दर्पण में दूर-दूर तक 
प्रतिबिंबित बस तुम हो
तुम हो ओस सुबह-सी
बिखरी-बिखरी
कहीं-कहीं 

अभी न निकलो
तुम सदियों तक
सूरज से कहता है कोई
आँखों में रहता है कोई ।

- पवन प्रताप सिंह 'पवन'
सौन्हर, नरवर (म.प्र.)
+918819959618
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