नवगीतः हम थे, तुम थे
- पवन प्रताप सिंह 'पवन'
हम थे तुम थे,
और गगन था
साथ साँझ की बेला।
सिंदूरी था क्षितिज सुहाना
मन-पंछी गाता था गाना
साथ-साथ कुछ दूर चले थे
तनिक दूर बस रहा ठिकाना।
सपना था
सो टूट गया
मन फिर से हुआ अकेला।
दूर-दूर तक सूनी राहें
सिर्फ सुनाई देती आहें
हौले से ही मुझे छुआ था
जाने किसकी थी वो बाहें।
कोमल-सा
स्पर्श छुअन का
मैंने अब तक झेला।
- पवन प्रताप सिंह 'पवन'
सौन्हर, नरवर (म.प्र.)
+918819959618
एक नवगीत जो मेरे दिल के करीब है।
- पवन प्रताप सिंह 'पवन'
हम थे तुम थे,
और गगन था
साथ साँझ की बेला।
सिंदूरी था क्षितिज सुहाना
मन-पंछी गाता था गाना
साथ-साथ कुछ दूर चले थे
तनिक दूर बस रहा ठिकाना।
सपना था
सो टूट गया
मन फिर से हुआ अकेला।
दूर-दूर तक सूनी राहें
सिर्फ सुनाई देती आहें
हौले से ही मुझे छुआ था
जाने किसकी थी वो बाहें।
कोमल-सा
स्पर्श छुअन का
मैंने अब तक झेला।
- पवन प्रताप सिंह 'पवन'
सौन्हर, नरवर (म.प्र.)
+918819959618






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